68- श्रीरासपंचाध्यायी -हनुमान प्रसाद पोद्दार चतुर्थ अध्याय सारा वातावरण मंगलमय हो रहा था। श्री यमुना जी ने भगवान की मधुरलीला के लिये अपने तरंगरूपी हाथों से वहाँ सुकोमल वा...
70- श्रीरासपंचाध्यायी -हनुमान प्रसाद पोद्दार पाँचवा अध्याय भ्रमरों के दल सुर में सुर मिलाकर गान कर रहे थे। उस समय उनकी वेणियाँ में गुँथे हुए पुष्प खिसक-खिसकर गिरे जा रहे थे...